Saturday, July 18, 2009

राजा भोज का भोजपुर

By दीपरत्न सिंह परमार

Bhojpur Shiv Lingपिछले पांच दशकों से हम भोपाल आते रहे हैं और हर प्रवास के मध्य एक बार भोजपुर हो आते थे. जी, हम उस महान शिव लिंग को अपने आगोश में लिए ध्वस्त विशाल मंदिर की ही बात कर रहे हैं जो भोपाल से २९ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में अपनी कहानी कह रहा है. यहाँ का शिव लिंग भारत के विशाल-काय लिंगों में से एक है (न कि सबसे विशाल, जैसी कुछ लोगों की धारणा है) और इसे पूर्व का सोमनाथ कहा गया है. इस मंदिर का निर्माण परमार वंशीय महान राजा भोज (भोजदेव) के शासन काल (१०१० – १०५३) में हुआ था. राजा भोज एक कला और साहित्य प्रेमी रहा है और बहुत से निर्माण कार्य करवाए थे. बेतवा नदी के किनारे हलकी ऊँचाई लिए चट्टानों के ऊपर बना यह भव्य मंदिर चौकोर है. सीढियों से चढ़ने पर लगभग २० फीट ऊपर हमें २७५ फीट लम्बी और ८० फीट चौडी समतल प्लेटफोर्म मिलती है जिसके एक छोर पर अपवाद स्वरुप पश्चिम दिशा की ओर देखता हुआ इस मंदिर का चंद्रशिला युक्त बुलंद दरवाज़ा बना हुआ है. किसी मंदिर में इतना विशाल दरवाजा तो हमने कहीं और नहीं देखा है. चौखट को, द्वारपाल, कुबेर, गंगा और यमुना (नदी देवियाँ) तथा उनके सेविकाओं की मूर्तियों से सजाया हुआ है. अलंकरण के लिए बारीक कारीगिरी वाली लताएँ एवं पुष्प भी बने हैं.मंदिर के अन्दर प्रवेश के लिए कुछ नीचे उतरना होता है जिसके लिए लोहे की सीढियां ए.एस.आई के द्वारा लगवाई गयीं हैं. उतरते ही आपके सामने होता है वह भव्य शिव लिंग जिसके सम्मुख हमारी अवस्था एकदम बौनों की सी हो जाती है. जलहरी जो चौकोर है उसके तीन खंड है और ऊँचाई २१.५ फीट बताई गयी है. उसके ऊपर का शिवलिंग ७.५ फीट ऊंची है और गोलाई में १७.८ फीट.Bhojpur Color

अन्दर से मंदिर की ऊँचाई का अंदाज़ तो नहीं लगाया जा सका लेकिन वृत्ताकार छत लगता है अन्दर बनाये गए चार बहुत ही विशाल खम्बो पर टिका हो. खम्बो पर शिव पार्वती, लक्ष्मी नारायण, ब्रह्मा सावित्री तथा राम सीता को ब्राकेट्स पर उकेरा गया है. छत की गोलाई में शिव गणों को वाद्य यंत्र बजाते हुए कुछ कुछ अंतराल में प्रर्दशित किया गया है. शिवलिंग के उत्तर और पूर्व की ओर नीचे ज़मीन पर ही मंदिर के स्थल विन्यास की रूप रेखा ( ब्लू प्रिंट) खुदी हुई है जिसे बाड लगाकर सुरक्षित किया गया है.Bhojpur Shiv

बाहर की तरफ दाहिनी दीवार पर तीन बहुत ही सुन्दर छज्जे दृष्टिगोचर होते हैं परन्तु उनका शीर्ष भाग क्षतिग्रस्त हो चुका है. मंदिर के ठीक सामने एक छतरी वाला मंडप है जो शिवजी के वाहन नंदी जी के लिए बनाया गया रहा होगा. परन्तु इस मंडप से लगा हुआ कुछ पीछे की ओर बगल से एक और छतरी है जो मंदिर का मूल हिस्सा रहा हो ऐसा नहीं लगता. देखा जाए तो यह मूल संरचना के सिमेट्री को बिगाड़ रहा है. इस छतरी के अन्दर एक संगमरमर का शिव लिंग ओर छोटा सा नंदी भी स्थापित है और एक पुजारी के रोजी रोटी का साधन बना हुआ है.

यहाँ इस पंडित से बात करने पर उसने बताया था कि यह मंदिर एक ही रात में निर्मित होना था परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई. इसलिए काम अधूरा रह गया. उनकी बातों को सुन कर हम तो खिसक लिए. एक और बुजुर्ग ने हमें बताया था कि यहाँ होशंगशाह का लड़का बाँध में डूब गया था. उसकी लाश भी नहीं मिली. नाराज़ होकर उसने बाँध को तोप से उड़ा दिया और मंदिर को भी तोप से ही गिरा देने की कोशिश की थी. इसके कारण मंदिर का ऊपर और बगल का हिस्सा गिर गया. इस तरह की कई बातें हम सुना करते थे. हाँ यह जरूर है कि एक प्राचीन बाँध के अवशेष मंदिर के पास अब भी देखे जा सकते हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि उस काल में भी बाँध बनाकर नदी के पानी को संचित करने का प्रयास हुआ था. कहते हैं कि इस बाँध का पानी कुल ५०० वर्ग किलोमीटर में फैला था. यहाँ तक कि आज जिसे मंडीदीप कहा जाता है वह वास्तव में द्वीप ही रहा. भोपाल के कई हिस्से इस पानी में डूबे हुए थे जैसे शाहपुरा आदि. आज की बड़ी झील भी उसी में समायी हुई थी. भोपाल गजेटियर में भी इस बात का उल्लेख है.

Bhojpur2

आज भी इस मंदिर के पीछे मिटटी से बना एक रपटा है जो दूर से मंदिर के शीर्ष तक बड़े बड़े पत्थरों को ले जाने के लिए बनाया गया होगा. यही विधि भारत के ऊंचे ऊंचे मंदिरों के निर्माण में अपनाई गयी थी.मंदिर के निर्मित हो जाने के बाद उस मिटटी को हटा दिया जाता था. परन्तु भोजपुर में मिटटी से बने इस निर्माण की उपस्थिति दर्शाती है कि वास्तव में मंदिर का छत पूरा बन ही नहीं पाया था. एक बात और ध्यान देने योग्य है. वह ये कि विशाल शिव लिंग में दरार दिखती है. जैसी की सम्भावना व्यक्त की गयी है, कोई बड़ा सा शिला खंड छत के निर्माण के समय नीचे गिरा होगा जिस से दरार निर्मित हुआ होगा. हमारी मान्यताओं के अनुसार ऐसे खंडित शिव लिंग पूजनीय नहीं होते . इसे एक अपशकुन भी माना गया होगा जिसके कारण आगे का निर्माण स्थगित कर दिया गया होगा. राजा भोज अपने जीवन काल में इस मंदिर के निर्माण को पूरा नहीं कर पाया होता तो उसके उत्तराधिकारी भी तो थे. परमार वंश का पतन तो लगभग सन १३१९ में हुआ जब अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण कर मालवा को अपने अधिकार में ले लिया था. पूरी सम्भावना है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हमारे इस मंदिर को भी भारी क्षति उठानी पड़ी हो अन्यथा इतनी जल्द यह इतना अधिक क्षतिग्रस्त नहीं हो सकता था.BhojpurBhojpur1जैसा की हमने प्रारंभ में ही कहा है कि पिछले पांच दशक से इस मंदिर को देखते आ रहे है और तब से ही भग्न भागों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास होता आ रहा है. ऊपर छत को भी ठीक कर मंदिर के मूल स्वरुप को प्राप्त करने की जी तोड़ कोशिश की गयी और अंत में सफल न हो सकने के कारण फाइबर ग्लास की बनी हुई एक छत डाल दी गयी है.श्वेत/श्याम चित्रों (ए.एस.आइ.एस के सौजन्य से) जो १०० वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, को देखकर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि आज हम जिस मंदिर को देख रहे हैं उसकी क्या हालत रही और वर्त्तमान स्वरुप में लाने के लिए कितना अथक प्रयास किया गया होगा. इस वर्ष के आरम्भ में इस मंदिर को यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में शामिल किये जाने हेतु आवश्यक प्रस्ताव भेजे गए हैं.

7 comments:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

अच्छी जानकारी।

mastkalandr said...

राजा भोज द्वारा निर्मित भोजपुर का प्राचीन शिव मंदिर दिखाने और उस से जुडी जानकारी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया मित्र,में कई बार भोपाल गया पर चाहकर भी पता नहीं क्यों भोजपुर न जा पाया.
आज आपने मंदिर के दर्शन घर बैठे करवा दिए ..लेख अच्छा है ,आपका स्वागत है ....मक्

gudia said...

achha or saakar kadam uthaya aapne is lekh ke madhyam se

उम्मीद said...

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
लिखते रहिये
चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
गार्गी

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

Deepratna Singh Parmar said...

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद ...!!

KEDAR TOMAR said...
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