हँस कर बोला करो, बुलाया करो,
आपका घर है, आया-जाया करो,
मुस्कराहट है हुस्न का जेवर,
रूप बढ़ता है, मुस्कुराया करो,
हद से बढ़कर हसीन लगते हो,
झुठी कसमे ज़रूर खाया करो,
हुक्म करना भी एक सखावत है,
हमको खिदमत कोई बताया करो,
बात करना भी बादशाहत है,
बात करना न भूल जाया करो,
ताकि दुनिया की दिलकशी न घटे,
नित नए पैरहन में आया करो,
कितने सादा मिजाज हो तुम सनम,
उस गली में बहुत न जाया करो...!!!
Monday, April 26, 2010
Thursday, February 18, 2010
Monday, February 15, 2010
Sunday, January 31, 2010
ज़ख्म नहीं भरे हैं वर्षों बाद भी..




तेईस साल गुजर गए. मानव इतिहास की सबसे क्रूरतम् औद्योगिक दुर्घटना यानि भोपाल गैस त्रासदी को याद करने का समय एक बार फिर आ चुका है. कुछ रस्मी विरोध प्रदर्शन होंगे, कुछ आंसू बहाए जाएंगे और फिर जिंदगी आगे बढ़ जाएगी. लेकिन उन हजारों लोगों का जीवन उस काली रात के बाद हमेशा के लिए बदल चुका है जिनके अपने इस त्रासदी की भेट चढे थे. दुर्भाग्य यह है कि आज भी हजारों लोग ऐसे हैं जो गैस के दुष्प्रभावों के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं.
आंकड़ों की बात करने का अब कोई औचित्य नहीं है. लेकिन आइए आज फिर देखते हैं मौत के उस खेल से जुड़े कुछ वीभत्स आंकड़े. ग्रीनपीस के आंकड़े कहते हैं करीब 8 हजार लोग तभी मारे गए थे. उसके बाद से अब तक करीब 25 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. हर माह 10 से 15 लोग आज भी गैस के दुष्प्रभावों से उपजी विकृतियों का शिकार होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं. करीब 5 लाख लोग गैस के दुष्प्रभावों का शिकार किसी न किसी रूप में हुए थे. करीब 1.5 लाख बच्चे गैस से प्रभावित माता पिता की संतानों के रूप में जन्म लेने के बाद स्थाई यप से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं.
गैस पीडितों को मुआवजा बंट गया, वारैन एंडरसन आज भी स्वतंत्र घूम रहा है और भोपाल इस जघन्य त्रासदी की रुला देने वाली दु:स्मृतियों को बोझ अपने सीने पर ढोने को विवश है. लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि हमने इस त्रासदी से क्या सीखा? क्या हमने ऐसी दुर्घटना फिर कभी ना हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास किए ? जवाब बहुत खराब है..... नहीं.
औद्योगिकीकरण की अंधी रफ्तार अब और तेज हो चुकी है और यह गारंटी कोई नहीं दे सकता कि ऐसा फिर नहीं होगा. यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी उस मानवभक्षी फैक्ट्री के खंडहरों में अब भी जहरीले रसायन पड़े हैं, जिन्हें हटाने को लेकर यदा कदा आवाज उठती है लेकिन राजनीति शुरू हो जाती है और कुछ नहीं हो पाता.
यदि हम ऐसी घटनाओं से सबक नहीं सीख सकते तो कुछ भी हमारी चेतना को जाग्रत करने में सक्षम नहीं है. पर्यावरण का विनाश अंतत: मानवीय जीवन के विनाश का कारण साबित होगा. भोपाल की जगह कोई और शहर होगा, यूनियन कार्बाइड की जगह कोई और कंपनी होगी लेकिन मरेंगे वहां भी इंसान ही. बस उनके नाम बदल जाएंगे. प्रकृति का आर्तनाद् सुनिए, यह पर्यानाद् है.... अपने बच्चों की खातिर, अपनी खातिर पर्यावरण का विनाश रोकिए
Tuesday, January 12, 2010
Saturday, January 9, 2010
राजपूत कौन
विविधायुध वान रखे नितही , रण से खुश राजपूत वही |
सब लोगन के भय टारन को ,अरी तस्कर दुष्टन मारन को |
रहना न चहे पर के वश में ,न गिरे त्रिय जीवन के रस में |
जिसके उर में शान्ति रही ,नय निति रखे राजपूत वही |
जननी भगनी सम अन्य त्रिया, गिन के न कभी व्यभिचार किया |
यदि आवत काल क्रपान गहि ,भयभीत न हो राजपूत वही |
धर्तिवान से धीर समीप रखे , निज चाकर खवासन को निरखे |
जिसने न रिपु ललकार सही , राजपूत रखे राजपूत वही |
पर कष्टं में पड़ के हरता ,निज देश सुरक्षण जो करता |
जिसने मुख से कही न नहीं ,प्रण पालत सो राजपूत वही |
सब लोगन के भय टारन को ,अरी तस्कर दुष्टन मारन को |
रहना न चहे पर के वश में ,न गिरे त्रिय जीवन के रस में |
जिसके उर में शान्ति रही ,नय निति रखे राजपूत वही |
जननी भगनी सम अन्य त्रिया, गिन के न कभी व्यभिचार किया |
यदि आवत काल क्रपान गहि ,भयभीत न हो राजपूत वही |
धर्तिवान से धीर समीप रखे , निज चाकर खवासन को निरखे |
जिसने न रिपु ललकार सही , राजपूत रखे राजपूत वही |
पर कष्टं में पड़ के हरता ,निज देश सुरक्षण जो करता |
जिसने मुख से कही न नहीं ,प्रण पालत सो राजपूत वही |
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