Monday, April 26, 2010

हँस कर बोला करो, बुलाया करो,
आपका घर है, आया-जाया करो,
मुस्कराहट है हुस्न का जेवर,
रूप बढ़ता है, मुस्कुराया करो,
हद से बढ़कर हसीन लगते हो,
झुठी कसमे ज़रूर खाया करो,
हुक्म करना भी एक सखावत है,
हमको खिदमत कोई बताया करो,
बात करना भी बादशाहत है,
बात करना न भूल जाया करो,
ताकि दुनिया की दिलकशी न घटे,
नित नए पैरहन में आया करो,
कितने सादा मिजाज हो तुम सनम,
उस गली में बहुत न जाया करो...!!!

Monday, February 15, 2010

Watercolor by I





1-Salsa Dance
2-Waterfall
3-Landscape

Sunday, January 31, 2010

ज़ख्म नहीं भरे हैं वर्षों बाद भी..





तेईस साल गुजर गए. मानव इतिहास की सबसे क्रूरतम् औद्योगिक दुर्घटना यानि भोपाल गैस त्रासदी को याद करने का समय एक बार फिर आ चुका है. कुछ रस्‍मी विरोध प्रदर्शन होंगे, कुछ आंसू बहाए जाएंगे और फिर जिंदगी आगे बढ़ जाएगी. लेकिन उन हजारों लोगों का जीवन उस काली रात के बाद हमेशा के लिए बदल चुका है जिनके अपने इस त्रासदी की भेट चढे थे. दुर्भाग्‍य यह है कि आज भी हजारों लोग ऐसे हैं जो गैस के दुष्‍प्रभावों के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं.


आंकड़ों की बात करने का अब कोई औचित्‍य नहीं है. लेकिन आइए आज फिर देखते हैं मौत के उस खेल से जुड़े कुछ वीभत्‍स आंकड़े. ग्रीनपीस के आंकड़े कहते हैं करीब 8 हजार लोग तभी मारे गए थे. उसके बाद से अब तक करीब 25 हजार से ज्‍यादा मौतें हो चुकी हैं. हर माह 10 से 15 लोग आज भी गैस के दुष्‍प्रभावों से उपजी विकृतियों का शिकार होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं. करीब 5 लाख लोग गैस के दुष्‍प्रभावों का शिकार किसी न किसी रूप में हुए थे. करीब 1.5 लाख बच्‍चे गैस से प्रभावित माता पिता की संतानों के रूप में जन्‍म लेने के बाद स्‍थाई यप से स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं.

गैस पीडितों को मुआवजा बंट गया, वारैन एंडरसन आज भी स्‍वतंत्र घूम रहा है और भोपाल इस जघन्‍य त्रासदी की रुला देने वाली दु:स्‍मृतियों को बोझ अपने सीने पर ढोने को वि‍वश है. लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि हमने इस त्रासदी से क्‍या सीखा? क्‍या हमने ऐसी दुर्घटना फिर कभी ना हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास किए ? जवाब बहुत खराब है..... नहीं.

औद्योगिकीकरण की अंधी रफ्तार अब और तेज हो चुकी है और यह गारंटी कोई नहीं दे सकता कि ऐसा फिर नहीं होगा. यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी उस मानवभक्षी फैक्‍ट्री के खंडहरों में अब भी जहरीले रसायन पड़े हैं, जिन्‍हें हटाने को लेकर यदा कदा आवाज उठती है लेकिन राजनीति शुरू हो जाती है और कुछ नहीं हो पाता.

यदि हम ऐसी घटनाओं से सबक नहीं सीख सकते तो कुछ भी हमारी चेतना को जाग्रत करने में सक्षम नहीं है. पर्यावरण का विनाश अंतत: मानवीय जीवन के विनाश का कारण साबित होगा. भोपाल की जगह कोई और शहर होगा, यूनियन कार्बाइड की जगह कोई और कंपनी होगी लेकिन मरेंगे वहां भी इंसान ही. बस उनके नाम बदल जाएंगे. प्रकृति का आर्तनाद् सुनिए, यह पर्यानाद् है.... अपने बच्‍चों की खातिर, अपनी खातिर पर्यावरण का विनाश रोकिए

Tuesday, January 12, 2010





मुझे बचपन से ही चित्रकला का शौक रहा है, और जब भी फुर्सत के पल पता हूँ, तो कुछ न कुछ पेंटिंग बनाने लगता हूँ, ये मेरे बनाये हुए कुछ चित्र प्रस्तुत कर रहा हूँ


यह कार्टून मैंने बल भास्कर पत्रिका से देख कर बनाया था....



यह कार्टून मैंने १२ साल की उम्र में बनाया था, तब मुझे कार्टून्स से बेहद प्यार था और अभी भी मुझे ये बेहद पसंद है इसलिए मैं आज भी एनिमेटेड पिक्चर देखता हूँ.

Saturday, January 9, 2010

राजपूत कौन

विविधायुध वान रखे नितही , रण से खुश राजपूत वही |
सब लोगन के भय टारन को ,अरी तस्कर दुष्टन मारन को |
रहना न चहे पर के वश में ,न गिरे त्रिय जीवन के रस में |
जिसके उर में शान्ति रही ,नय निति रखे राजपूत वही |
जननी भगनी सम अन्य त्रिया, गिन के न कभी व्यभिचार किया |
यदि आवत काल क्रपान गहि ,भयभीत न हो राजपूत वही |
धर्तिवान से धीर समीप रखे , निज चाकर खवासन को निरखे |
जिसने न रिपु ललकार सही , राजपूत रखे राजपूत वही |
पर कष्टं में पड़ के हरता ,निज देश सुरक्षण जो करता |
जिसने मुख से कही न नहीं ,प्रण पालत सो राजपूत वही |

Saturday, July 18, 2009

राजा भोज का भोजपुर

By दीपरत्न सिंह परमार

Bhojpur Shiv Lingपिछले पांच दशकों से हम भोपाल आते रहे हैं और हर प्रवास के मध्य एक बार भोजपुर हो आते थे. जी, हम उस महान शिव लिंग को अपने आगोश में लिए ध्वस्त विशाल मंदिर की ही बात कर रहे हैं जो भोपाल से २९ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में अपनी कहानी कह रहा है. यहाँ का शिव लिंग भारत के विशाल-काय लिंगों में से एक है (न कि सबसे विशाल, जैसी कुछ लोगों की धारणा है) और इसे पूर्व का सोमनाथ कहा गया है. इस मंदिर का निर्माण परमार वंशीय महान राजा भोज (भोजदेव) के शासन काल (१०१० – १०५३) में हुआ था. राजा भोज एक कला और साहित्य प्रेमी रहा है और बहुत से निर्माण कार्य करवाए थे. बेतवा नदी के किनारे हलकी ऊँचाई लिए चट्टानों के ऊपर बना यह भव्य मंदिर चौकोर है. सीढियों से चढ़ने पर लगभग २० फीट ऊपर हमें २७५ फीट लम्बी और ८० फीट चौडी समतल प्लेटफोर्म मिलती है जिसके एक छोर पर अपवाद स्वरुप पश्चिम दिशा की ओर देखता हुआ इस मंदिर का चंद्रशिला युक्त बुलंद दरवाज़ा बना हुआ है. किसी मंदिर में इतना विशाल दरवाजा तो हमने कहीं और नहीं देखा है. चौखट को, द्वारपाल, कुबेर, गंगा और यमुना (नदी देवियाँ) तथा उनके सेविकाओं की मूर्तियों से सजाया हुआ है. अलंकरण के लिए बारीक कारीगिरी वाली लताएँ एवं पुष्प भी बने हैं.मंदिर के अन्दर प्रवेश के लिए कुछ नीचे उतरना होता है जिसके लिए लोहे की सीढियां ए.एस.आई के द्वारा लगवाई गयीं हैं. उतरते ही आपके सामने होता है वह भव्य शिव लिंग जिसके सम्मुख हमारी अवस्था एकदम बौनों की सी हो जाती है. जलहरी जो चौकोर है उसके तीन खंड है और ऊँचाई २१.५ फीट बताई गयी है. उसके ऊपर का शिवलिंग ७.५ फीट ऊंची है और गोलाई में १७.८ फीट.Bhojpur Color

अन्दर से मंदिर की ऊँचाई का अंदाज़ तो नहीं लगाया जा सका लेकिन वृत्ताकार छत लगता है अन्दर बनाये गए चार बहुत ही विशाल खम्बो पर टिका हो. खम्बो पर शिव पार्वती, लक्ष्मी नारायण, ब्रह्मा सावित्री तथा राम सीता को ब्राकेट्स पर उकेरा गया है. छत की गोलाई में शिव गणों को वाद्य यंत्र बजाते हुए कुछ कुछ अंतराल में प्रर्दशित किया गया है. शिवलिंग के उत्तर और पूर्व की ओर नीचे ज़मीन पर ही मंदिर के स्थल विन्यास की रूप रेखा ( ब्लू प्रिंट) खुदी हुई है जिसे बाड लगाकर सुरक्षित किया गया है.Bhojpur Shiv

बाहर की तरफ दाहिनी दीवार पर तीन बहुत ही सुन्दर छज्जे दृष्टिगोचर होते हैं परन्तु उनका शीर्ष भाग क्षतिग्रस्त हो चुका है. मंदिर के ठीक सामने एक छतरी वाला मंडप है जो शिवजी के वाहन नंदी जी के लिए बनाया गया रहा होगा. परन्तु इस मंडप से लगा हुआ कुछ पीछे की ओर बगल से एक और छतरी है जो मंदिर का मूल हिस्सा रहा हो ऐसा नहीं लगता. देखा जाए तो यह मूल संरचना के सिमेट्री को बिगाड़ रहा है. इस छतरी के अन्दर एक संगमरमर का शिव लिंग ओर छोटा सा नंदी भी स्थापित है और एक पुजारी के रोजी रोटी का साधन बना हुआ है.

यहाँ इस पंडित से बात करने पर उसने बताया था कि यह मंदिर एक ही रात में निर्मित होना था परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई. इसलिए काम अधूरा रह गया. उनकी बातों को सुन कर हम तो खिसक लिए. एक और बुजुर्ग ने हमें बताया था कि यहाँ होशंगशाह का लड़का बाँध में डूब गया था. उसकी लाश भी नहीं मिली. नाराज़ होकर उसने बाँध को तोप से उड़ा दिया और मंदिर को भी तोप से ही गिरा देने की कोशिश की थी. इसके कारण मंदिर का ऊपर और बगल का हिस्सा गिर गया. इस तरह की कई बातें हम सुना करते थे. हाँ यह जरूर है कि एक प्राचीन बाँध के अवशेष मंदिर के पास अब भी देखे जा सकते हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि उस काल में भी बाँध बनाकर नदी के पानी को संचित करने का प्रयास हुआ था. कहते हैं कि इस बाँध का पानी कुल ५०० वर्ग किलोमीटर में फैला था. यहाँ तक कि आज जिसे मंडीदीप कहा जाता है वह वास्तव में द्वीप ही रहा. भोपाल के कई हिस्से इस पानी में डूबे हुए थे जैसे शाहपुरा आदि. आज की बड़ी झील भी उसी में समायी हुई थी. भोपाल गजेटियर में भी इस बात का उल्लेख है.

Bhojpur2

आज भी इस मंदिर के पीछे मिटटी से बना एक रपटा है जो दूर से मंदिर के शीर्ष तक बड़े बड़े पत्थरों को ले जाने के लिए बनाया गया होगा. यही विधि भारत के ऊंचे ऊंचे मंदिरों के निर्माण में अपनाई गयी थी.मंदिर के निर्मित हो जाने के बाद उस मिटटी को हटा दिया जाता था. परन्तु भोजपुर में मिटटी से बने इस निर्माण की उपस्थिति दर्शाती है कि वास्तव में मंदिर का छत पूरा बन ही नहीं पाया था. एक बात और ध्यान देने योग्य है. वह ये कि विशाल शिव लिंग में दरार दिखती है. जैसी की सम्भावना व्यक्त की गयी है, कोई बड़ा सा शिला खंड छत के निर्माण के समय नीचे गिरा होगा जिस से दरार निर्मित हुआ होगा. हमारी मान्यताओं के अनुसार ऐसे खंडित शिव लिंग पूजनीय नहीं होते . इसे एक अपशकुन भी माना गया होगा जिसके कारण आगे का निर्माण स्थगित कर दिया गया होगा. राजा भोज अपने जीवन काल में इस मंदिर के निर्माण को पूरा नहीं कर पाया होता तो उसके उत्तराधिकारी भी तो थे. परमार वंश का पतन तो लगभग सन १३१९ में हुआ जब अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण कर मालवा को अपने अधिकार में ले लिया था. पूरी सम्भावना है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हमारे इस मंदिर को भी भारी क्षति उठानी पड़ी हो अन्यथा इतनी जल्द यह इतना अधिक क्षतिग्रस्त नहीं हो सकता था.BhojpurBhojpur1जैसा की हमने प्रारंभ में ही कहा है कि पिछले पांच दशक से इस मंदिर को देखते आ रहे है और तब से ही भग्न भागों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास होता आ रहा है. ऊपर छत को भी ठीक कर मंदिर के मूल स्वरुप को प्राप्त करने की जी तोड़ कोशिश की गयी और अंत में सफल न हो सकने के कारण फाइबर ग्लास की बनी हुई एक छत डाल दी गयी है.श्वेत/श्याम चित्रों (ए.एस.आइ.एस के सौजन्य से) जो १०० वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, को देखकर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि आज हम जिस मंदिर को देख रहे हैं उसकी क्या हालत रही और वर्त्तमान स्वरुप में लाने के लिए कितना अथक प्रयास किया गया होगा. इस वर्ष के आरम्भ में इस मंदिर को यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में शामिल किये जाने हेतु आवश्यक प्रस्ताव भेजे गए हैं.

Mera man matwala...

चंचल बादल झूम के छाए, गाये मन मतवाला
पल-पल आँचल उडे हवा में , झलके रूप का प्याला
मीठे-मीठे गीत सुनाये, बहती नदियों की धरा
उड़ता बादल देख-देख के नाच उठे मन मोर
सावन की अलबेली रुत ने कैसा रंग जमाया
चंचल बादल झूम के छाए, गाये मन मतवाला.....

यूँ मेरी मखमूर जवानी, हवा में तीर चलाये
जैसे एक अनदेखा सपना आँखों में लहराए
बिना मीत के प्रीत निभाऊ, मेरा प्यार निराला
चंचल बादल झूम के छाए, गाये मन मतवाला....

Wednesday, January 28, 2009

Tera Ehsaas

तेरा एहसास

आँख लगी ही थी की तेरी यादों की आहट ने जगा दिया,
हवा चली ही थी की तेरे पल्लू की खुसबू ने चमन महका दिया,
मेघ घिरे ही थे की तेरी जुल्फों के सावन ने मन नेहला दिया,
कही कोई आस-पास नज़र तो आता नहीं था,
फिर भी तेरे वजूद ने नाजाने कैसे दिल बहला दिया.

Kash-ma-kash

aisa hua nahi hai par aisa na ho kahi,
usne mujhe na dekh ke dekha na ho kahi,
kadmon ki chaap der se aati hai kaanon mein,
koi mere khayalon me firta na ho kahi,
sanki hui hawaon me khusboo ki aanch hai,
patton me koi phool dehkta na ho kahi,
ye kon jhankta hai kiwad ki ot se,
baati bujha kar dekho savera na ho kahi....

Pehli nazar ka pehla pyar...

meri chahaton ke chere tabse damakne lage,
tumhari mohabbat ne mujhe jabse chu liya,
har sans se aati hai gulab ki khusboo,
meri zindgi ko; istarah chu liya,
haan; aye mere dil ko pal-pal churane wali,
teri ungliyon ke poro ne mere jishm ko chu liya,
bistar par kasmasata hai koi kwaab jawa sa,
teri shararton ne meri need ko chu liya,
ruh dhoondhati rehti hai hardam dilkash panahon ko,
kitni gherayi ko gehrayi se chu liya,
pehle padhte me; phool sa mojhud raaha kitabon me,
aur ab; meri college ki chhuttiyon ko chu liya.....
                                                                                    Deep

Ek Tamanna

ek tamanna hai tumhein apna banane ki,
ek tamanna hai tumhein pane ki,
ek tamanna hai tumhein aankhon mein basane ki,
ek tamanna hai tumhare kwaab dekhne ki,
ek tamanna hai tumhein palkon mein basane ki,
tumhare saath din-raat guzarne ki,
ek tamanna hai tumhare saath mehfil sajane ki,
ek tamanna hai un anmol chhano ko kahbi na khone ki.....
     Deep

Eterna Love

हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल.. पल ये हैं प्यार के पल.. चल आ मेरे संग चल.. चल सोचें क्या.. छोटी सी है ज़िन्दगी.. कल मिल जायें, तो होगी खुश-नसीबी.. हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे येह पल.. हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल.. पल ये हैं प्यार के पल.. चल आ मेरे संग चल.. चल सोचें क्या.. छोटी सी है ज़िन्दगी.. कल मिल जाये, तो होगी खुश-नसीबी.. हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे ये पल.. शाम का आंचल ओढ के अयी.. देखो वो रात सुहानी.. आ लिखदें हम दोनो मिलके.. अपनी ये प्रेम कहानी.. हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे ये पल.. आने वाली सुबह जाने, रंग क्या लाये दीवानी.. मेरी चाहत को रख लेना, जैसे कोई निशानी.. हम रहें या न रहें.. याद आयेंगे ये पल.. हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल.. पल येह हैं प्यार के पल.. चल आ मेरे संग चल.. चल सोचें क्या.. छोटी सी है ज़िन्दगी.. कल मिल जायें, तो होगी खुश-नसीबी.. हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे ये पल..